Wednesday 27 February 2013

ऐसे बढ़ेगा गन्ने की खेती में मुनाफा


भारतीय गन्ना शोध संस्थान के वैज्ञानिक ने विकसित की नई तकनीक


लखनऊ। लखनऊ के भारतीय गन्ना शोध संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. एसएन सिंह ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसके जरिए गन्ने के बीजों पर आने वाला खर्च एक तिहाई रह जाएगा। 'केन नोड' नाम की गन्ना बोने की इस नई तकनीक से केवल कम बीज के इस्तेमाल से गन्ने का ज्यादा उत्पादन हो सकेगा  बल्कि इससे समय की भी काफी बचत होगी।

इस नई तकनीक को ईजाद करने वाले, गन्ना शोध संस्थान, लखनऊ में कृषि वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत डॉ. एसएन सिंह बताते हैं, ''आमतौर पर गन्ना बोने के लिए बीज के तौर पर तीन आंख वाले गन्ने की पेड़ी का प्रयोग किया जाता है, पर 'केन नोड' तकनीक में तीन आंखों की जगह एक आंख वाला टुकड़ा ही प्रयोग किया जाता है।'' 

गन्ना बोने की इस नई तकनीक के फायदों के बारे में एसएन सिंह आगे बताते हैं, ''गन्ने के 3-3 आंख वाले टुकड़े बोने के वक्त प्रति हेक्टेयर के लिए कम से कम 70 से 80 कुंतल बीज की ज़रुरत होती है जबकि 'केन नोड' तकनीक से केवल 15 से 18 कुंतल प्रति हेक्टेयर बीज से ही काम चल जाता है। इस विधि से दूसरा ायदा यह है कि कुल मिलाकर 27-28 दिन में ही गन्ना ज़मीन से बाहर निकल आता है। इस तरह पुरानी विधियों की तुलना में इससे कम से कम 12 से 15 दिनों की बचत होती है। इस तकनीक का एक और फायदा यह है कि नर्सरी में गन्ने का जो बीज पहले से अंकुरित हो जाता है उसी बीज को बोया  जाता है, जिससे पौधे के उगने की संभावना बहुत कम हो जाती है। ऐसे में गन्ने के पौधों के बीच अंतर नहीं रहता और कम ज़मीन पर ज्यादा फसल उगाई जा सकेगी।''

आमतौर पर गन्ने के बीज की कीमत, गन्ने की कीमतों से 15 फीसदी तक ज्यादा होती है।  सामान्य दिनों में 300 से 400  रुपये तक बिकने वाले गन्ने के    बीज बुआई के दिनों में 500 रुपये प्रति कुंतल तक बिकने लगते हैं। ऐसे में गन्ना शोध संस्थान द्वारा विकसित की गई यह तकनीक किसानों को काफी लाभ पहुंचा सकती है।
गन्ना शोध संस्थान में कृषि प्रसार विभाग में कार्यरत वैज्ञानिक डॉ. कामता प्रसाद बताते हैं, ''एक एकड़ में उगाए जाने वाले गन्ने के बीजों पर तक रीबन 22 हज़ार रुपये खर्च आता है। इस तकनीक का इस्तेमाल करके अब 6 हज़ार में काम चल जाएगा। इससे लगभग 12 हज़ार रुपये की बचत होगी। वहीं 1 हेक्टेयर में 5 टन के करीब गन्ना उगाया जा सकेगा।''

वो आगे कहते हैं, ''गन्ने को उगाने में ज्यादा पैसा लगता है और गन्ने की कीमतें नहीं बढ़ रही। यहां ज्यादातर किसान बटाई पर खेत लेते हैं। बड़े किसानों से उधार लेकर भूमिहीन किसान गन्ने की खेती करते हैं। ज़मीन और सिंचाई के पानी दोनों का अतिरिक्त भार उनकी कमर तोड़ देता है। ऐसे में नर्ई तकनीकों के जरिए गन्ना उगाने में आने वाली लागत को कम करना जरूरी है ताकि किसानों को मुनाफा  हो सके।''

क्या है 'केन नोड' तकनीक
खेत के पास एक छोटी सी नर्सरी बनाकर उसमें बराबर अनुपात में सड़ी हुई गोबर की खाद, मिट्टी और हो सके तो बालू की परत बिछा दी जाती है। इस परत में गन्ने के इन एक आंख वाले छोटे छोटे टुकड़ों को बिछा दिया जाता है। इन टुकड़ों को एक लीटर पानी में दस से 15 मिलीलीटर दवा में भिगोकर बिछाया जाता है, फि इनके ऊपर खाद डाल दी जाती है। 5-6 दिन में ही गन्ने के इन टुकड़ों की आंख फू लने लगती है, जिसका मतलब है कि ये अंकुरित होने लगते हैं।


गन्ना उत्पादन की नर्ई तकनीक देगी ज्यादा मुनाफा 


गन्ना शोध संस्थान में प्रमुख कृषि वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत डॉ. एसएन सिंह ने हाल ही में च्केन नोडज्नाम से एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसकी मदद से गन्ने की उत्पादकता को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है। इस नई विधि और गन्ने के उत्पादन से जुड़े मसलों पर उनसे विस्तार से बातचीत की उमेश पंत ने :

सवाल : केन नोड तकनीक के बारे में कुछ बताइये?
जवाब : अब तक हमारे देश में गन्ने को बोने के लिये बीज के तौर पर गन्ने के पौंधे के तीन आंख या गांठ जितने लम्बे टुकड़े इस्तेमाल किये जाते रहे हैं। इस तकनीक में हम बीज के रुप में टुकड़ों को एक आंख तक छोटा कर देते हैं। फि इन टुकड़ों को बोने से पहले ही एक नर्सरी बनाकर अंकुरित कर लिया जाता है। उसके बाद इनमें से वही टुकड़े बोये जाते हैं जो अच्छी तरह अंकुरित हो गये हों।

सवाल : इस तकनीक से क्या फायदा होगा?
जवाब : कई फायदे होंगे। पहला ये कि बीज पहले की तुलना में बहुत कम लगेगा। गन्ना बोने वाले ज्यादातर किसानों की यही समस्या होती है कि इसका बीज सल की तुलना में 15 फीसदी तक ज्यादा महंगा होता है। इस तरीके से किसानों का बीज पर आने वाला खर्च तकरीबन तीन गुना कम हो जाएगा। दूसरा ये बोने के बाद जो बीज अंकुरित नहीं हो पाते हैं वो जिस जगह पर बोये जाते हैं वो जगह खाली चली जाती है। माने वहां पर गैप रह जाता है। इस तकनीक से वो गैप बहुत कम हो जाएगा क्योंकि केवल वही बीज बोये जाएंगे जो अंकुरित होंगे। ऐसे में ज़मीन की बचत भी की जा सकेगी। तीसरा फायदा ये होगा कि इस तकनीक से लगभग 27-28 दिनों में ही गन्ने की सल ज़मीन से बाहर निकल आती है। जो कि और विधियों की तुजना में यही कोई 15 दिन कम है। ऐसे में इस विधि से टाइम की बचत भी होगी।

सवाल : उत्तर प्रदेश का गन्ना उत्पादन में क्या योगदान है?
जवाब : देश में कुल मिलाकर 5.29 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती होती है। जिसका आधा यानि 24 लाख हक्टेयर के तकरीबन अकेले उत्तर प्रदेश का हिस्सा है। गन्ने के उत्पादन में सबसे आगे तमिलनाडु है जहां 108 टन प्रति हैक्टेयर गन्ना उत्पादन  होता है। उत्तर प्रदेश उत्पादन के लिहाज से पीछे है। यहां 58 से 59 टन प्रति हैक्टेयर गन्ना उत्पादन होता है। सहारनपुर, बागपत, गाजियाबाद, कुछ ऐसे जिले हैं जहां 75 से 80 टन प्रति हैक्टेयर गन्ने का उत्पादन होता है।

सवाल : गन्ने के उत्पादन के लिये सबसे उपयुक्त जलवायु देश के किन हिस्सों की है?
जवाब : दक्षिण भारत के राज्यों मसलन तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, केरला वगैरह में है। महाराष्ट्र और गुजरात में 88 टन प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन होता है। उत्तर प्रदेश जलवायु के हिसाब से उतना अच्छा नहीं है क्योंकि यहां गर्मी और सर्दी दोनों बहुतायत में होती है, लेकिन यहां के ज्यादातर किसान गन्ना उत्पादन पर निर्भर हैं। वो इसे छोडऩा नहीं चाहते। क्योंकि आमदनी के लिहाज से यह बहुत महत्वपूर्ण सल है।

सवाल : गन्ने की कीमतों को लेकर किसानों और सरकार के बीच लम्बे समय से तनातनी चलती रही है। इस बारे में आपका क्या कहना है?
जवाब : फि लहाल गन्ने की कीमत बाजार में 278 से 280 रुपया प्रति क्विंटल है। इसकी कीमतों को लेकर जो विवाद हुए है वो ज्यादातर राजनैतिक वजहों से हैं। अगर साल में 600 क्विंटल गन्ना भी किसान उगा ले तो उसकी आमदनी 1 लाख 68 हज़ार के करीब हो जाती है। 

सवाल : गन्ने की रिकवरी 1930 में 9 फीसदी के आसपास थी, 2011 आते आते भी वो 10.17 ीसदी के आंकड़े को ही छूं पाई है। क्या कारण लगता है आपको?
जवाब : गन्ने की बुआई आमतौर पर दो बार होती है। शरतकालीन, अक्टूबर और बसंतकालीन, रवरी मार्च में। गन्ने की बुआई के लिये खेतों में नालियां खोदी जाती हैं। इन नालियों के बीच ढ़ाई से 3 ीट का अन्तर रखा जाता है। इस अन्तर को कम करने से पौंधों को उचित रोशनी नहीं मिल पाती। और पौंधों का अच्छी तरह विकास नहीं हो पाता। लेकिन किसान ज्यादा बोने के चक्कर में नालियों के बीच दो ीट से ज्यादा अन्तर नहीं रखते। जो कि पौंधों के लिये नुकसानदायक होता है। कई किसान बुआई के वक्त बीज के रुप में पूरा गन्ना रोप देते हैं, उससे ऊपरी भाग तो जम जाता है लेकिन जड़ें अच्छी तरह नही जम पाती और सल अच्छी नहीं होती। फास्फोरस डालने पर पौंधे की रिकवरी अच्छी नहीं हो पाती। रिकवरी से मतलब ये है कि हर 100 टन से कितनी चीनी बनी। सामान्यतौर पर 100 टन गन्ने से 8 से 9 टन चीनी मिलती है।

सवाल : गन्ने के उत्पादकता और रिकवरी को किसान कैसे बढ़ा सकते हैं ताकि उन्हें ज्यादा लाभ मिले?
जवाब : गन्ने की खेती की उत्पादकता इस बात पर भी निर्भर करती है कि हमने गन्ने के बीच के लिये कैसी प्रजातियां चुनी हैं। ऐसी प्रजातियां जिनमें रोग कम होते हैं उनसे रिकवरी अच्छी मिलती है। जब गन्ना मिल को सप्लाई किया जाता है उस वक्त वो 10 महीना पुराना ज़रुर होना चाहिये। मतलब ये कि वो कच्चा हो। अगर गन्ना पूरी तरह से परिपक्व नहीं होगा तो चीनी का उत्पादन कम होगा। गन्ने पर लगने वाला कीड़ा भी रिकवरी को कम कर देता है। गन्ने की बुआई से लेकर कटाई तक कीड़ों के लगने की सम्भावना रहती है। ये कुछ वजहें हैं जिनाके ध्यान में रखकर किसान गन्ने के उत्पादन को बढ़ा सकते हैं।

सवाल : गन्ने के खेतों में किसान जो दवाईयां डालते हैं उनका उत्पादकता पर कैसे असर पड़ता है?
जवाब : खेतों में दवा डालते हुए कई बातें ध्यान में रखना जरुरी है। एक हैक्टेयर खेत में साढ़े 6 लीटर क्लोरपिरिफ ोस नाम की दवा को 1800 लीटर पानी में घोल के  छिड़काव करने से फसल को दीमक जैसे कुछ कीड़ों से बचाया जा सकता है। मार्च के महीने में लगने वाले अंकुर भेदक से भी ये दवा बचाव करती है। गन्ने के तीन तीन आंख के टुकड़े बोने से परिणाम अच्छे मिलते हैं। बुआई से पहले 112 ग्राम बावस्टीन को 112 लीटर पानी में घोलकर गन्ने के कटे हुए टुकड़ों को इसमें अच्छे से भिगोना चाहिये। इससे गन्ने का जमाव अच्छा होता है। गन्ने के कुछ टुकड़ों को बचाकर खेत में ही कहीं जमीन के नीचे दबा देना चाहिये। ताकि जिन जगहों पर गैप रह जाये उन जगहों पर इन्हें बोया जा सके।

सवाल : दवाओं की गुणवत्ता उत्पादन में क्या असर डालती है?
जवाब : गाँवों के किसान आमतौर पर जो दवाएं लेते हैं वो अच्छी गुणवत्ता की नहीं होती। इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। सस्ती दवाओं का प्रयोग करने से फसल को नुकसान होने की सम्भावना ज्यादा रहती है। इसीलिये दवा हमेशा अच्छी गुणवत्ता की लेनी चाहिये।

गन्ना उगाने के लिए आप भी ले सकते हैं ट्रेनिंग

गन्ना शोध संस्थान में हम गन्ने की खेती को लेकर कई तरह के प्रशिक्षण देते हैं। जो किसान यहां आते हैं उन्हें मुफ्त में टे्रनिंग दी जाती है। इसके अलावा कई ऐसी ट्रेनिंग भी हैं जिनके लिये हम शुल्क लेते हैं। अमूमन 3 दिन की ट्रेनिंग का शुल्क तीन हज़ार रुपये रखा जाता है जिसमें 17-18 लैक्चर और खेतों के भ्रमण की मदद से व्यावहारिक प्रशिक्षण देना शामिल है। इसके अलावा हम यहां आने वाले किसानों को यूरिया, पोटाश जैसे बेसिक इनपुट और दवाएं मुफ्त में देते हैं। किसानों को उनके खेतों में जाकर डिमोस्ट्रेशन भी दिया जाता है। किसानों को फोन पर भी जानकारियां दी जाती हैं। किसान कॉल सेन्टर के जरिये हमारे पास यहां कॉल आती हैं, हम कोशिश करते हैं कि किसानों को अच्छी जानकारी दी जाये ताकि वो अपनी सलों के उत्पादन में सुधार ला पाएं। 
डाकामता  प्रसाद
वैज्ञानिक  कृषि  प्रसार
भारतीय  गन्ना  शोध  संस्थान


2 comments:

  1. khrcha koon jodega 600 kuntal gaana ugane me 150000 ka khrcha aayega hramkhoor

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  2. फि लहाल गन्ने की कीमत बाजार में 278 से 280 रुपया प्रति क्विंटल है। इसकी कीमतों को लेकर जो विवाद हुए है वो ज्यादातर राजनैतिक वजहों से हैं। अगर साल में 600 क्विंटल गन्ना भी किसान उगा ले तो उसकी आमदनी 1 लाख 68 हज़ार के करीब हो जाती है।

    ye kisne likha ...........600 kuntal gaana ugane ka ka khrchaa jra joodo.........2 lakh ka khrcha aayega sarm kroo soch kr bolo

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