Tuesday, 16 April, 2013

पांच महीने में ही तैयार होगी अरहर की फसल


पंकज कुमार
कानपुर। अब तक एक साल मे तैयार होने वाली अरहर की फसल अब सिर्फ 5 महीनों में ही तैयार हो सकेगी। भारतीय दलहन अनुसंधान केंद्र, कानपुर के वैज्ञानिक अरहर की ऐसी प्रजाति पर काम कर रहे हंै। सामान्यत: अरहर की फ सल 9 महीने में तैयार होती है। कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि संकर प्रजाति की इस अरहर से पैदावार में 25 से 30 तक की बढ़ोत्तरी भी होगी।
कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर सुशील कुमार सिंह कहते हैं, "हम अरहर की संकर प्रजाति पर काम कर रहे है, उम्मीद है कि अगले साल तक इस प्रजाति का लाभ किसानों को मिलने लगेगा। इस प्रजाति की मदद से अरहर की फसल ना केवल कम समय में तैयार हो जाएगी बल्कि उत्पादन भी बढ़ेगा।"

पिछले कुछ सालों में भारत में दलहन के दामों में खासी बढ़ोत्तरी हुई है। भारतीय दलहन अनुसन्धान केंद्र, कानपुर के अनुसार भारत को अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए हर साल 18 मिलियन टन दलहन की जरूरत पड़ती है, जबकि हम सिर्फ  15 मिलियन टन ही उत्पादन कर पा रहें हैं। दलहन की संकर प्रजाति पर शोध कर रहे कृषि वैज्ञानिक सुशील कुमार सिंह कहते हैं, "साल 2009-10 में दलहन का उत्पादन 12 मिलियन टन था, जो साल 2011-12 में बढ़ कर 17 मिलियन टन हो गया, बावजूद इसके यह हमारी जरूरतों से काफी कम है।"

भारतीय दलहन अनुसंधान केंद्र द्वारा विकसित की गईं प्रजातियां, आइपीए-203ए नरेंद्र अरहर-1 को यदि उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रयोग किया जाए तो उसी क्षेत्रफल में अरहर का उत्पादन 20-25  प्रतिशत तक बढ़ जाएगा। संभावना है कि उत्तर भारत के लिए संकर प्रजाति की अरहर 1 साल में आ जाएगी। इसमें सामान्य अरहर के मुकाबले उत्पादकता 25-30  %  ज्यादा है और यह केवल 5 महीनों में तैयार हो जाएगी जबकि सामान्य अरहर 9 महीने में तैयार होती है।

देश  के  कुल दलहन उत्पादन में उत्तर प्रदेश का दूसरा स्थान है। कुल उत्पादन में उत्तर प्रदेश का 16 फीसदी योगदान है, लेकिन उचित समर्थन मूल्य ना मिलने के कारण प्रदेश के बहुत से किसानों का दलहन की फ सल से मोहभंग होता जा रहा है। फ तेहपुर जिले के कीर्ति खेड़ा गाँव के अखिलेश सिंह कहते है  "हमें अरहर कि फ सल का उचित समर्थन मूल्य नहीं मिलता है। बाज़ार में अरहर 80 रुपये किलो बिक रही है, जबकि हमे सिर्फ  3500-4000  रुपये प्रति कुंतल का भाव मिलता है।"


भारतीय दलहन अनुसन्धान केंद्र कानपुर  में कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर सुशील  कुमार सिंह से पंकज कुमार की हुई बातचीत के कुछ अंश:

सवाल: भारत में दलहन का उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए?

जवाब: देश में कृषि, जलवायु परिस्थितियां विभिन्न प्रकार की है विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल दलहन तकनीकें अपना कर हम उत्पादन बढ़ा सकते हैं। दलहन का उत्पादन बढ़ाने के दो प्रमुख आयाम है पहला तो यह है की हम दलहनी फ सलों का क्षेत्रफल बढ़ा दें और दूसरा यह कि विभिन्न फसल प्रणाली में दलहनी फसलों का समायोजन करके।

-मसूर की उत्पादकता में वृद्धि करके

धान की फ सल के बाद खेत खाली  हो जाते है । इन क्षेत्रों में अगर धान की फ सल के बाद हम रबी की फसल मसूर लगा दें  तो कम से कम 1 लाख हेक्टयर दलहन का उत्पादन क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है । मसूर को पानी की कोई खास ज़रुरत नही पड़ती है और यह 25-30 दिनों में तैयार भी हो जाती है।

-मूंग की उत्पादकता में वृद्धि करके 

मूंग की फसल को गेंहू की कटाई के बाद मतलब 20-25  मार्च से 20-25  अप्रैल तक बुवाई कर के बरसात से पहले इसके कटाई की जा सकती है । यह सिर्फ 55 दिनों की फ सल होती है। इससे ना केवल किसान को गेंहू और धान के बाद अतिरिक्त लाभ भी होगा बल्कि जमीन की उर्वर्रा शक्ति भी बनी रहेगी ।

-मटर की उत्पादकता में वृद्धि करके

 मटर की उत्पादकता अन्य  दलहनी फसलों से ज्यादा होती है  मटर का क्षेत्रफल तो नही बढाया सकता है लेकिन समय पर पानी देकर और उचित रासायनिक उर्वरक देकर इसकी उत्पादकता बढ़ायी  जा सकती है । 40-45 दिनों के बाद फूल  आने की अवस्था में पानी  जरुर देना चाहिए

सवाल: किसान भाई क्या गलतियाँ करते है जिससे उत्पादन घटता है ?

जवाब: दलहनी फ सलों में कीड़े लगने, बीमारी लगने की  संभावना ज्यादा रहती है जो कि धान और गेंहूँ की फसलों में काफी कम होती है। कीड़े लगे या ना लगे आप प्रबंधन पहले करिए, क्योंकि कीड़े लग जाने के बाद कोई भी दवा नही है जो  पूरी तरह से कारगर हो फ सल को नुकसान हो ही जाता है।

सवाल: सरकार दलहनी फ सलों का उत्पादन बढऩे के लिए क्या कर रही है ?

जवाब: बिलकुल, सरकार  इस पर बहुत  ध्यान दे  रही है । देश भर के 16 प्रदेशों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन चल रहा है जिसमें हर राज्य के कृषि विभाग को उत्पादन बढऩे के लिए लक्ष्य दिया गया है। सरकार तो उत्पादन बढ़ाने के लिए काम कर ही रही है।  उत्पादन में कमी नही आयी है बल्कि उत्पादन तो बढ़ा ही है। पहले 2009-10  में 11 मिलियन टन उत्पादन था जबकि 2011-12  में उत्पादन बढ़ कर 17 मिलियन टन हो गया। अब तो किसानों को उनकी फ सलों का उचित समर्थन मूल्य भी मिल रहा है ।

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